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समाज में परिवर्तन सम्यक आचरण, बंधुत्व की भावना के आत्मीयतापूर्वक प्रबोधन से होगा – डॉ. मोहन भागवत जी<समाज का दर्पण होती है पत्रिकाएँ – देवप्रसाद भारद्वाज जी<ध्येय के प्रति समर्पित विश्वास के साथ चलने की प्रेरणा विश्वामित्र जी के जीवन से मिलती है – भय्याजी जोशी<हमें आजादी त्याग और बलिदान से मिली है - रवि कुमार<आजादी को कायम रखने के लिए हमे जातिवाद से उपर उठना होगा - राकेश त्यागी<अखंड भारत के निर्माण का संकल्प लें युवा: भूषण  कुमार<महिलाओं में  होती है सहनशीलता और सेवा भावना: रवि कुमार <जैविक खेती के प्रति किया जागरूक<एफडीआई के खिलाफ स्वदेशी जागरण मंच ने खोला मोर्चा <स्वदेशी जागरण मंच ने फूंकी चीनी वस्तुओं की होली

विचार 

गुरु पूर्णिमा – गुरु के प्रति आभार का दिन

July 6, 2016 | विचार | Comments (0)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: । गुरु साक्षात् परम्ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम: ।। भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से ही गुरु को विशेष दर्जा प्राप्त है. यहां गुरु-शिष्य परंपरा सदियों पुरानी है. हमारे यहां गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान प्राप्त है. गुरु को ईश्वर का साक्षात्कार करवाने वाला माना गया है. गुरु की महानता का परिचय संत कबीर के इस दोहे से हो जाता है गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काकै लागूं पाये, बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दियो मिलाये । गुरु का महत्व तो गुरु शब्द में ही निहित है. संस्कृत में गु का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और रु का अर्थ है हटाने वाला. इसलिए गुरु का अर्थ है अंधकार को हटाने वाला. माता-पिता हमारे जीवन के प्रथम गुरु होते हैं जो हमारा पालन-पोषण करते हैं. हमें बोलना-चलना सिखाते हैं तथा वे सभी संस्कार देते हैं जिनके द्वारा हम समाज में रहने योग्य बनते हैं. उसके आगे जीवन को सार्थकता प्रदान करने के लिए जिस ज्ञान एवं शि

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शिक्षा सुधार की हर कोशिश ‘भगवाकरण’ नहीं होती

July 6, 2016 | विचार | Comments (0)

भारत सरकार में 2009 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दूसरा मंत्रिमंडल गठित हुआ, शिक्षा में गुणात्मक विकास और व्यापक विस्तार के लिए शिक्षा संस्था और विद्यार्थी का एक मानक निर्धारित किया। इस मानक के अनुसार जिन शिक्षा संस्थाओं में विज्ञान, गणित, भाषा और सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई नहीं होगी, उन ”विद्यालयों” और न पढ़ने वाले ”छात्रों” को विद्यार्थी की श्रेणी में शामिल नहीं माना जायेगा। इसका यह तात्पर्य नहीं कि जो संस्थाएं केवल मजहबी या कर्मकांडी शिक्षा दे रही हैं, उन्हें बंद कर दिया जायेगा। इस मानक निर्धारण के पीछे उद्देश्य था विद्यार्थियों को आधुनिकता का ज्ञान कराना। इस्लामी शिक्षा देने के लिए मदरसा नाम से जो संस्थाएं चल रही हैं इस नियम से अधिक प्रभावित होंगी, यह स्वाभाविक था। यद्यपि प्रगतिशील विचार वाले लोगों ने इसका स्वागत किया और बहुत से मदरसों में आज इन विषयों को पढ़ाया जाने लगा है लेकिन अधिसंख्य मदरसे ऐसे हैं जो अभी रूढि़वादी ही बन

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उठो भारत ! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से संपूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करो

July 6, 2016 | विचार | Comments (0)

उठो भारत ! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से संपूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करो

‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ ये कहावत जितनी व्यक्ति पर लागू होती है, उतनी ही समाज पर भी लागू होती है. विजय की आकांक्षा व विजय की अनुभूति समाजमन को बल देते हैं. जब समूचा राष्ट्र ही अपनी शक्तियों को भूलने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है, तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे इस मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है. आत्म-विस्मृति की मानसिकता पराभव की मानसिकता होती है,अकर्मण्यता की मानसिकता होती है. ऐसे में स्वप्न भी संकुचित हो जाते हैं. अपना सब कुछ क्षुद्र,त्याज्य लगने लगता है और पराई परम्परायें,विचार व संस्कार केवल अनुकरणीय ही नहीं सम्माननीय भी बन जाते हैं. 19वीं शताब्दी के अंत में भारत की यही स्थिति थी. कहीं से कोई आशा नहीं दिखाई देती थी. पराधीनता तो थी ही, स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करने का आत्मविश्वास भी नष्ट सा हो गया था. अंग्रेजों के अंधानुकरण का यह चरम काल था. विदेशी शिक्षा में शिक्षित उच्च वर्ग अंग्रेज-भक्ति में ही धन्यता समझने लगा था. इस बौद्

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कर्म करने की प्रेरणा देती है भगवद्गीता

July 6, 2016 | विचार | Comments (0)

(21 दिसंबर, गीता जयन्ती पर विशेष) “जब शंकाएं मुझ पर हावी होती हैं, और निराशाएं मुझे घूरती हैं, जब दिगंत में कोई आशा की किरण मुझे नजर नहीं आती, तब मैं गीता की ओर देखता हूं.” – महात्मा गांधी. संसार का सबसे पुराना दर्शन ग्रन्थ है भगवद्गीता. साथ ही साथ विवेक, ज्ञान एवं प्रबोधन के क्षेत्र में गीता का स्थान सबसे आगे है. यह केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं है, अपितु एक महानतम प्रयोग शास्त्र भी है. केवल पूजा घर में रखकर श्रद्धाभाव से आराधना करने का नहीं, अपितु हाथ में लेकर युद्धभूमि में लड़कर जीत हासिल करने का सहायक ग्रन्थ है. महाभारत युद्ध के प्रारम्भ में कर्ममूढ़ होकर युद्ध से निवृत होने की इच्छा व्यक्त करने वाले अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने गीतोपदेश के द्वारा ही कर्म पूर्ण करने की प्रेरणा दी. अर्जुन ऐसा कहते हैं कि युद्ध करने से भी अच्छा अर्थात विहित कर्म करने से भी श्रेष्ठ युद्ध भूमि छोड़कर जाना है. वह तर्क देते हैं कि युद्ध के कारण बहने वाले खून की नदी प

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भारत माता की जय

July 6, 2016 | विचार | Comments (0)

भारत माता की जय

शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश हो जिसके स्वाधीनता के सत्तर साल पश्चात् देश की जय-जयकार के सामने सवालिया निशान लगता हो. शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश हो जिसमें स्वाधीनता संग्राम के मंत्र स्वरूप वंदे मातरम् की घोषणा को दोहराने में लोग विरोध करते हों, जहां पड़ोसी देश से बेरोकटोक आने वाले घुसपैठियों को रोकने हेतु छात्रों को आंदोलन करना पड़े, जहाँ राष्ट्रध्वज की वंदना के लिए सख्ती बरतने की चर्चा होती हो. दुर्भाग्यवश दुनिया में ऐसा एकमात्र देश अपना भारत ही बना हुआ है, जहाँ यह सभी अनहोनी जैसी बातें होती है. स्वार्थ, राजनीति और वोट बैंक के लालच ने इस देश के राजनेताओं, विचारकों को इतना निचले स्तर पर ला खड़ा किया है कि देशभक्ति, देशप्रेम का सौदा करने में उन्हें जरा भी हिचकिचाहट नहीं होती है. भारत माता की जय, ‘वंदे मातरम्’ कहते-कहते अनेक क्रांतिकारी देश की आजादी की जंग में फांसी पर झूल गए. सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर में क्रांतिकारियों ने औरंगाबाद के न

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समस्याओं का हल साधनों में नहीं साधना में निहित है

July 6, 2016 | विचार | Comments (0)

विजयादशमी विजय का उत्सव मनाने का पर्व है. यह असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, दुराचार पर सदाचार की, तमोगुण पर दैवीगुण की, दुष्टता पर सुष्टता की, भोग पर योग की, असुरत्व पर देवत्व की विजय का उत्सव है. भारतीय संस्कृति में त्यौहारों की रंगीन श्रृंखला गुंथी हुई है. प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी रूप में कोई संदेश लेकर आता है. लोग त्यौहार तो हर्षोल्लास सहित उत्साहपूर्वक मनाते हैं, किंतु उसमें निहित संदेश के प्रति उदासीन रहते हैं. विजयादशमी यानि कि दशहरा आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान् श्रीराम के द्वारा दैत्यराज रावण का अंत किये जाने की प्रसन्नता व्यक्त करने के रूप में और माँ दुर्गा द्वारा आतंकी महिषासुर का मर्दन करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. इसके साथ इस पर्व का सन्देश क्या है इसके विषय में भी विचार करने की आज आवश्यकता है. भारतीय संस्कृति हमेशा से ही वीरता की पूजक एवं शक्ति की उपासक रही है. शक्ति के बिना विजय संभव नहीं है.

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गुरु पूर्णिमा और संघ

July 6, 2016 | विचार | Comments (0)

अपने राष्ट्र और समाज जीवन में गुरुपूर्णिमा-आषाढ़ पूर्णिमा अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव है. व्यास महर्षि आदिगुरु हैं. उन्होंने मानव जीवन को गुणों पर निर्धारित करते हुए उन महान आदर्शों को व्यवस्थित रूप में समाज के सामने रखा. विचार तथा आचार का समन्वय करते हुए, भारतवर्ष के साथ उन्होंने सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन किया. इसलिए भगवान वेदव्यास जगत् गुरु हैं. इसीलिए कहा है – ‘व्यासो नारायणम् स्वयं’- इस दृष्टि से गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा गया है. गुरु की कल्पना “अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन् चराचरं, तत्पदं दर्शितंयेनं तस्मै श्री गुरुवे नम:” यह सृष्टि अखंड मंडलाकार है. बिन्दु से लेकर सारी सृष्टि को चलाने वाली अनंत शक्ति का, जो परमेश्वर तत्व है, वहां तक सहज सम्बंध है. यानी वह जो मनुष्य से लेकर समाज, प्रकृति और परमेश्वर शक्ति के बीच में जो सम्बंध है. इस सम्बंध को जिनके चरणों में बैठकर समझने की अनुभूति पाने का प्रयास करते हैं, वही गुर

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भारत में ही सबसे ज्यादा सुरक्षित हैं अल्पसंख्यक

July 6, 2016 | विचार | Comments (0)

क्या हिन्दुत्ववादी उग्रता का प्रचार अतिरेक अल्पसंख्यकों में उन्मादी अभिव्यक्ति का कारण बन रहा है. यह प्रश्न इसलिए किया जाने लगा है क्योंकि कतिपय चोरी या किसी आस्था के भवन पर पत्थरबाजी की घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस ढंग से उछाला जा रहा है, उससे यह आभास होता है कि विश्वभर में सबसे अधिक अल्पसंख्यक कहीं असुरक्षित हैं तो वह भारत है. क्या यह सही आंकलन है ? और क्या इसाई और इस्लाम मतावलम्बियों को भारत में आम नागरिकों समान मिले संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है. कुछ चोर उच्चकों की गतिविधियों को हिन्दुत्ववादी संगठनों पर आरोप मढ़ने का प्रयास एक गहरी साजिश के तहत किया जा रहा है. जिसका शिकार हमारा प्रबुद्ध वर्ग हो रहा है. इस प्रकार असद्दुदीन ओवैसी, अरशदमदनी और आजम खान में ‘मुस्लिम नेता’ बनने की होड़ में उग्र अभिव्यक्ति की स्पर्धा माहौल को बिगाड़ रही है. अल्पसंख्यकों का भारत में उत्पीड़न बढ़ रहा है, सबसे पहले तब उछाला गया, जब अटल बि

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