सहकारिता की परंपरा भारत में प्राचीन काल से :  डा.मोहन भागवत 

सरसंघचालक डा.मोहन भागवत ने किया गुरूग्राम में सहकार सम्मेलन को संबोधित

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केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह बोले, लक्ष्मणराव इनामदार राष्ट्रीय सहकारी अनुसंधान व विकास अकादमी बनेगी सहकारिता के लिए प्रेरणा

विसंके, गुरुग्राम।  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने कहा कि सहकारिता की परंपरा भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है। बिना सहकार नहीं उद्धार के मूलमंत्र को भाव देने का कार्य लक्ष्मणराव इनामदार ने किया था। उनका मानना था कि बिना संस्कार नहीं सहकार। सहकारिता का स्वरूप ऐसा हो चला था कि केवल चलाने वालों का उद्धार हो लेकिन जिनके लिए होना चाहिए उनका नहीं हो। सहकार भारती ने सहकारिता आंदोलन को भाव के साथ आगे बढ़ाने की दिशा में प्रशंसनीय कार्य किया है। इसी भाव के साथ देश में अब सहकारिता के क्षेत्र में हम एक बड़ी छलांग लगाने जा रहे हैं। लक्ष्मण राव के भाव को आधार मानते हुए उत्तर भारत में अब सहकारिता के काम को आगे बढ़ाया जाएगा। यह बात गुरुग्राम में लक्ष्मणराव इनामदार राष्ट्रीय सहकारी अनुसंधान एवं विकास अकादमी में सहकार भारती की ओर से आयोजित सहकार सम्मेलन के दौरान अपने संबोधन में कही।
 मुख्य वक्ता के रूप में डा. भागवत ने सहकारिता की व्याख्या करते हुए बताया कि इसमें स्पर्धा की बजाए सहयोग की भावना रहनी चाहिए। सहकारिता किसी पर उपकार नहीं बल्कि किसी को स्वावलंबी बनाने का कार्य है। आज की नई पीढ़ी में स्वावलंबी होने की बात है। उनके सपनों को पंख देने का कार्य सहकारिता के माध्यम से ही संभव है। यह ऐसा वर्ग है जो परिश्रम के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने लक्ष्मणराव इनामदार से जुड़े संस्मरणों का जिक्र करते हुए बताया कि मुझे उनके निकट रहकर काम करने का अवसर मिला है। उनके जीवन में विवेक, संस्कार, मर्यादा से मैं बेहद प्रभावित हुआ है। मुझे इस कार्यक्रम केे जरिए उन्हें भावांजलि देने का अवसर मिला है। उनकी जीवनी में उन्हें सहकार भाव के प्रणेता बताया गया सहकारिता के संदर्भ में उनके जीवन की सबसे सटीक व्याख्या है।
सरसंघचालक ने कहा कि सहकारिता मे अंत्योदय का भाव होना अति आवश्यक है। सहकारिता के जरिए किसी भी प्रकार के भय का मुकाबला परस्पर सहयोग से किया जा सकता है। संस्कार भारती के मूलमंत्र बिना संस्कार, नहीं सहकार वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सही है। आपसी सहयोग संवेदना के साथ होना चाहिए। ज्ञान, पूंजी और श्रम तीनों के सहयोग से सहकारिता के लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। समाज को समर्थ, स्वावलंबी व कल्याण के कार्य सहकारिता से ही संभव है। उन्होंने कहा कि आज हमारा अपना समाज है। विभिन्न भाषा, पंथ, संप्रदायों से होने के बावजूद हम सब भारत माता के पुत्र है। आपस में सहयोग रहा तो सब संकटों का समाधान है। समाज में आत्मीय भाव से आपसी सहयोग पूरी तरह गैर राजनीतिक होना चाहिए। स्पर्धा की बजाए सहयोग की भावना से ही सहकारिता आंदोलन आगे बढ़ेगा। कार्यक्रम के दौरान सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम की ओर से तैयार सहकार-22 पुस्तिका का विमोचन भी किया।   

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