संचार का हिन्दू मॉडल – संवाद का स्‍वराज

विश्व संवाद केंद्र। प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि मानव के लिए संचार एक अनिवार्यता है क्योंकि संचार के बिना समाज रचना असंभव है। हालाकि प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा में संचार को विषय के रूप में नहीं लिया गया है फिर भी लगभग हर ग्रंथ (वेद, उपनिषद्, पुराण इत्यादि) में संचार के बाकी प्रक्रिया और व्यवहारिक रूप उदाहरण सहित देखे जा सकते हैं। महत्वपूर्ण ये है कि संचार की भारतीय दृष्टि को समझने के लिए इसकी पश्चिम की दृष्टि को कुछ समय के लिए नजरअंदाज करना उचित है। यह वांछनीय है। संस्कृत के ग्रंथ हों या भाषाओं और बोलियों की पुस्तकें, भारतीय ज्ञान परंपरा में संचार के लिए चार महत्वपूर्ण सिद्धान्त सामने आते हैं। सत्य बोलना ही धर्म है, असत्य नहीं बोलना चाहिए। वही सत्य बोलें जो समाज के हित में हो, तथ्य एक होते हुए भी उनकी प्रस्तुती के अनेक रूप हो सकते हैं। इस तरह का विश्लेषण पश्चिम की अभिकल्पनाओं में नहीं मिलता है। संचार के परिप्रेक्ष्य के विषय में भी अनेक स्पष्ट कल्पनाएँ पढ़ने के लिए मिलती हैं। ऋग्वेद में एक मंत्र के आधार पर बोधाचार्य नागार्जुन ने ‘प्रतितस्यसमुतपात’ की विस्तृत व्याख्या की है, जिससे संचार के परिप्रेक्ष्य को समझने में स्पष्ट मिलता है। साधारण भाषा में कहा जाए तो ‘प्रतितस्यसमुतपात’ के एक साथ दो अर्थ हैं, जिनको संचार के लिए प्रयोग तो किया जा सकता है कि प्रत्येक मानव, प्रत्येक अन्य मानव से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बँधा हुआ है एवं प्रत्येक संचार, प्रत्येक अन्य संचार पर निर्भर है। फ्रेंक डांस के संचार के मॉडल में इस विचार की झलक दिखती है। इसी प्रकार इन्द्र के आर्किटेक्ट के बनाये प्रतिरूप को इन्द्रजाल कहा जाता है। ये इस सृष्टि की रचना का वर्किंग मॉडल है, अकल्पनीय जाल है और जाल के दो अदृश्य धागे जहाँ मिलते हैं, वहाँ पर एक नग है जो कि जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। हर नग का अपना कम या अधिक प्रकाश है। संचार के माध्यम से विद्युत की तरह नग का प्रकाश कम या अधिक होता है। परंतु किसी एक नग में संचार के मध्य प्रकाश में परिवर्तन से पूरी मानवता प्रभावित होती है। इस विचार में संचार के अनादि एवं अनंत होने का सिद्धान्त स्पष्ट होता है, जिसे आज के पश्चिम के वैज्ञानिक भी समझते हैं। संचार की प्रक्रिया को समझने के लिए तीन और कल्पनाएँ शास्त्रों में मिलती है। संचार की प्रक्रिया सधारणीकरण की है, जिसका अर्थ Sharing और Simplification से बहुत बड़ा है। सधारणीकरण के कारण से संचार के भागीदारों में सहृदयता भिन्न-भिन्न स्तरों की उत्पन्न होती है और परिणामस्वरूप किसी न किसी प्रकार का रसास्वादन होता है। रस की उत्पत्ति केवल प्राप्तकर्ता में ही नहीं है यह सामूहिक है। जिज्ञासा होती है कि हमारे भारतीय ज्ञान, राज्य एवं समाज व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं सूचना के अधिकार की चर्चा नहीं है। वास्तव में भारतीय व्यवस्थाओं में अधिकारों और दायित्वों की बात ही नहीं है निष्काम भाव से कर्म करने का उपदेश है और संचार या संवाद भी एक कर्म है। इसके लिए किसी का ये अधिकार नहीं है कि अन्यों को ये अधिकार या स्वतंत्रता की घोषणा करे। वास्तव में भारतीय समाज में संवाद को उतना ही महत्व दिया है जितना सांस लेने को, भोजन करने को और प्रजनन करने को। इसलिए अगर संचार की भारतीय कल्पना को नाम दिया जाना हो तो कहा जा सकता है कि भारत की संवाद की कल्पना संवाद के स्वराज की हैं संवाद नैसर्गिक है। हर मनुष्य इसका प्रयोग करता है। अपने बुद्धि और विवेक से करता है, अनुभव के आधार पर संवाद का कौशल निखरता जाता है। यही संवाद का स्वराज है और भारत का संचार का मॉडल है। इसे ‘हिन्दू मॉडल ऑफ कम्युनिकेशन’ भी कहा जा सकता है क्योंकि परंपराओं के अनुसार हिन्दुस्तान, भारतवर्ष, भारत, आर्यव्रत और जम्बूद्वीप पर्यायवाची है।  

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