भारत में ही सबसे ज्यादा सुरक्षित हैं अल्पसंख्यक

क्या हिन्दुत्ववादी उग्रता का प्रचार अतिरेक अल्पसंख्यकों में उन्मादी अभिव्यक्ति का कारण बन रहा है. यह प्रश्न इसलिए किया जाने लगा है क्योंकि कतिपय चोरी या किसी आस्था के भवन पर पत्थरबाजी की घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस ढंग से उछाला जा रहा है, उससे यह आभास होता है कि विश्वभर में सबसे अधिक अल्पसंख्यक कहीं असुरक्षित हैं तो वह भारत है. क्या यह सही आंकलन है ? और क्या इसाई और इस्लाम मतावलम्बियों को भारत में आम नागरिकों समान मिले संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है. कुछ चोर उच्चकों की गतिविधियों को हिन्दुत्ववादी संगठनों पर आरोप मढ़ने का प्रयास एक गहरी साजिश के तहत किया जा रहा है. जिसका शिकार हमारा प्रबुद्ध वर्ग हो रहा है. इस प्रकार असद्दुदीन ओवैसी, अरशदमदनी और आजम खान में ‘मुस्लिम नेता’ बनने की होड़ में उग्र अभिव्यक्ति की स्पर्धा माहौल को बिगाड़ रही है.

अल्पसंख्यकों का भारत में उत्पीड़न बढ़ रहा है, सबसे पहले तब उछाला गया, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह आरोप और अधिक प्रकोपितढंग से शायद इसलिए उछाला जा रहा है क्योंकि वर्षों तक उन पर बिना सबूत उस दंगे को उभारने का आरोप लगाया गया जो गोधरा रेलवे स्टेशन पर एक रेल बोगी में आग लगाकर 69 कारसेवकों को जीवित जला देने के अत्यंत नृशंस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप घटित हुआ था और जिसको नियंत्रित करने के लिए तत्कालीन मोदी सरकार ने जो सुरक्षात्मक कदम उठाये थे, उसमें अब तक के किसी भी दंगे में पुलिस की गोली से मरने वाले हिन्दुओं को सर्वाधिक होने के बावजूद, उसका संज्ञान नहीं लिया गया. जिस ”हिडेन एजेंडा” शब्दावलि का अविष्कार वाजपेयी शासन के संदर्भ किया गया था, उसे ही मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद फिर से दोहराया जाने लगा है. क्यों? क्योंकि सरकार पर कुशासन, भ्रष्टाचार आदि के आरोप जो आमतौर पर प्रत्येक कांग्रेसी सरकार के साथ नत्थी हैं, उसका कोई अवसर न तो वाजपेयी की सरकार के खिलाफ मिला और न अब मिल पा रहा है. जिन्हें सरकार का विरोध करना है, उनके लिए ”अल्पसंख्यक” उत्पीड़न भारतीय जनता पार्टी तथा संघ परिवार के संगठनों को बदनाम करने के लिए सर्वोत्तम हथियार समझ में आता है.

यदि आंकड़ों में जाएं तो जितने दंगे कांग्रेस के शासनकाल में हुए और जितने देशहित विरोधी आचरण करने वाले उस काल में उभरे उसके प्रमाण में भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में कुछ भी नहीं हुआ. अभी जिस हाशिमपुरा हत्याकांड में न्यायालय ने सभी आरोपियों को बरी किया है, उसमें पीएसी घरों से निकालकर मार डालने और लाशों को नहर में फेंक देने जैसा आरोप भाजपा ही नहीं किसी भी गैर कांग्रेसी सरकार पर नहीं लगाया गया है. यह घटना केंद्र में और राज्य दोनों में कांग्रेसी सरकार रहते घटित हुई है. मुजफ्फरनगर का दंगा भाजपा नहीं राज्य में सपा और केंद्र में कांग्रेस सरकार के समय में हुआ है. गुजरात के दंगे के संदर्भ में भी अनेक कल्पित आरोपों की फेहरिस्त में भी यह आरोप शामिल नहीं है कि सरकार या सशस्त्र बल ने अल्पसंख्यकों पर हमला किया.

लेकिन भाजपा को सत्ता में आने से रोकने या सत्ता में आने के बाद बदनाम करने के लिए उसके विरोधियों के पास एक ही मुद्दा है अल्पसंख्यक उत्पीड़न. चोरी करने वाले भी हिन्दुत्ववादी या दक्षिणपंथी अर्थात संघ द्वारा प्रेरित बताने की होड़ केवल राजनीति असरवादी लोगों के बीच नहीं है, प्रबुद्ध समझे जाने वाले लोग भी इस संदर्भ भ्रमित होकर जो अभिव्यक्ति कर रहे हैं, उसके दुष्परिणाम की ओर उनका ध्यान नहीं जा रहा है. कुछ अवांछनीय तत्वों की हरकतों को दक्षिण की संज्ञा प्रदान करने की अभिव्यक्ति का उपयोग सेवा से धर्मान्तरण अथवा शस्त्र से या छल से धर्मान्तरण करने वालों को जिस रूप में मुखरित होने का अवसर प्रदान कर रहा है, वह बहुत खतरनाक दिशा में बढ़ते जाने का संदेश दे रहा है. पाकिस्तान हमारा पड़ोसी देश है. वहां हिन्दुओं और इसाइयों का जैसा उत्पीड़न हुआ है और हो रहा है उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिल सकती. यही नहीं तो वहां की सत्ता संभालने वाले वर्ग ने इस्लामी वर्ग ने इस्लामी आस्था वाले तमाम संप्रदायों को न केवल गैर इस्लामी घोषित कर दिया है, बल्कि उनका कत्लेआम जारी है. क्या है अरब देशों में जहां अपनी आत्मिक आस्था के अनुसार गैर इस्लामी लोगों को घर के भीतर अनुष्ठान करना अपराध की श्रेणी में रखा गया है और उन्हें मृत्युदंड दिया गया है. जो मानवाधिकार के लम्बरदार हैं, क्या उन्होंने कभी यह भी विचार किया है चाहे अमेरिका हो या अफ्रीका इसाई मतावलम्बी लोगों ने स्थानीय लोगों पर कैसा अत्याचार किया है.

दुनिया भर में भारत एक ऐसा देश है और सदैव रहा है, जहां अपनी आस्था के अनुसार आचरण करने की सभी को समान अवसर की गारंटी मिली है. यह गारंटी संविधान में गारंटी देने के पूर्व सनातन काल से चली आ रही है. यहां न तो कोई नादिरशाह हुआ न अब्दाली, न मोहम्मद गोरी व गजनवी जिसने तलवार के बल पर आस्था परिवर्तन किया. और न कोई ऐसी संस्था जिसने इसाई मिशनरियों के समान निर्धनता वाले समूह को लक्ष्य कर ”सेवा” के नाम पर धर्मान्तरण. भारत के जिन मनीषियों ने विदेशों या इस देश में भी अपने अभिमत का प्रचार किया है, वह उस समूह या व्यक्ति के साथ जिन्हें प्रबुद्ध माना गया है. हमारा यह आचरण आज भी जारी है, यही कारण है कि पीड़ित मानवता को प्रकृति के शोषण के कारण−जिन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है, उससे उबरने का एकमात्र तरीका भारत के प्रकृति के साथ तादात्मय को माना जा रहा है. यह पक्ष ऐसा है जिसका बहुत विस्तार किया जा रहा है. विदेशी इसाई मिशनरियों की भेदभाव मुक्त आचरण के खिलाफ स्वदेशी इसाई संगठनों का अभियान उनके आचरण की गवाही देता है.

यहां पर मेरा उद्देश्य इस अभियान के फलस्वरूप भयभीत ”अल्पसंख्यकों” में उनमादी अभिव्यक्ति की जो होड़ चल पड़ी है, उसके दुष्परिणाम के प्रति सतर्क करना है. भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने के लिए अंग्रेजी हुकुमत ने बंगाल का विभाजन करने में असफलता के बाद ढाका के नवाब को मुखौटा बनाकर 1906 में मुस्लिम लीग को जन्म देकर वैमनस्यता और उन्माद के जिस दौर में डाल दिया, वह लाखों लोगों की हत्या और भारत विभाजन के रूप में सामने आया. वह उन्माद 1947 के बाद दब तो गया था, लेकिन अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में भारतीय नागरिकों का वर्गीकरण चलता रहा. जिसके फलस्वरूप अविश्वास की खाई गहराती गई. इसी खाई का विस्तार हो रहा है. यदि किसी को घर छोड़ने का अधिकार है तो उसे वापिस होने के अधिकार से कैसे वंचित किया जा सकता है. यदि किसी को ”सेवा” के नाम से घर से उजाड़ा जा सकता हे, भय और सत्ता के अत्याचार से बेघर किया जा सकता है तो घर की एकता के महात्म को समझाकर उसकी वापसी को क्यों रोकने के दुराग्रह की पैरवी की जा रही है. यह प्रयास एक देश एक जन की भावना को खंडित करता है और जिन्हें खंड−खंड स्थिति में अपना महल खड़ा करने का एकमात्र उपाय ही समझ में आता है, उनके लिए अनुकूलता प्रदान करता है. इसके कितने खतरे हैं?

सबसे ज्यादा दंगे इस माहौल के कारण ही हुए आजादी के प्रारम्भिक वर्षों को छोड़कर इन दंगों में जनधन की सर्वाधिक हानि ”अल्पसंख्यकों” की ही हुई. अब तक के आंकड़े तो यही बताते हैं कि सबसे ज्यादा दंगाई जो पुलिस की गोली से मारे गए वे अल्पसंख्यक ही थे. उनके प्रति ”बहिष्कार” की भावना से उनकी ही सब से ज्यादा हानि हुई. जिन्होंने पाकिस्तान बनाया, उन्होंने भारतीय मुसलमानों का क्या भला किया. आज भी कुछ मुस्लिम नेता जो उन्माद पैदा कर रहे हैं तथा उनका इतिहास सौदेबाजी का नहीं रहा है और यह सब क्या सौदेबाजी के लिए नहीं कर रहे हैं. जहां तक इसाई मिशनरियों का सवाल है तो वे घोषित रूप से धर्मान्तरण के लिए ही ‘सेवा’ कर रहे हैं, अब जबकि आत्म जागृति के लिए सेवा करने वाले उनके उद्देश्य में बाधक बन रहे हैं, कहीं चोरी होने कहीं पत्थर फैंकने की घटना को अपनी पोल खुलने से भयभीत होकर अंतरराष्ट्रीय प्रचार से जूलियन रिवेरो जैसे भारतीयों के लिए आदर्श व्यक्ति को भी भ्रमित कर रहे हैं.

लूट और बलात्कार की देश में जितनी घटनाएं हो रही हैं, उसमें अल्पसंख्यकों की संख्या एक या दो प्रतिशत से अधिक नहीं है. अट्ठानवे प्रतिशत तो बहुसंख्यक अर्थात हिन्दू ही इसके शिकार हैं. कानून व्यवस्था के इस मसले को हिन्दुओं ने कभी भी मजहबी वस्त्रों से ढककर सांप्रदायिक उन्माद नहीं बढ़ाया. यह सब अल्पसंख्यक के नाम पर हो रहा है. क्या कश्मीरी पंडितों से अधिक किसी का उत्पीड़न और शोषण हुआ है. क्या उनसे अधिक किसी की माताओं−बहनों की अस्मिता लूटी गई है? कौन देशी या विदेशी मानवाधिकार संगठन या व्यक्ति या अल्पसंख्यकों का हितैशी या सेक्युलरिज्म का अलमबरदार उनके लिए मुखरित हुआ है. ”अल्पसंख्यकों” से बहुत स्पष्ट कहने में परहेज नहीं करना चाहिए उनके लिए जो छाती पीट रहे हैं उनके अतीत की गतिविधियों पर भी दृष्टिपात करें अन्यथा देश की मुख्यधारा से उनकी दूरी बढ़ती जायेगी और इस बढ़ती दूरी के कारण उनको मजहबी समानता के आधार पर भड़का कर अपना उल्लू सीधा करने वाले लाभ उठाते रहेंगे. कोई भी सरकार बहुमत से बनती है. मोदी सरकार भी बहुमत से बनी है. उसका लक्ष्य सवा सौ करोड़ भारतीय हैं. इनमें अल्पसंख्यक भी शामिल हैं. यदि सरकार इस लक्ष्य से भटकी है तो उस पर अवश्य लोकतांत्रिक प्रहार करें. इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती कि मजहबी या पांथिक उन्माद एकपक्षीय नहीं रह सकता, वह उभयपक्षीय होता है और उसके क्या परिणाम होते हैं इसके ब्यौरे में जाने की आवश्यकता नहीं है. आवश्यकता है अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की अवधारणा के अन्त की. उभारना है एक देश एक जन की भावना को.

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

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