भारतीय दर्शन क्षेत्र या संप्रदाय के बारे में न सोच कर पूरे विश्व का चिंतन करता है : आचार्य देवव्रत

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विश्व समवाद केंद्र , पंचकुला ,  26 नवंबर, हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में विश्व में फैले आतंकवाद युद्ध और हिंसा का समाधान है। यह दर्शन किसी एक व्यक्ति, क्षेत्र या संप्रदाय के बारे में न सोच कर पूरी सृष्टि की चिंता करता है। इसलिए इस विचार में सभी लोगों का सुख निहित है। आचार्य देवव्रत शुक्रवार को चंडीगढ़ के सेक्टर 37 स्थित लॉ भवन में पंचनद शोध संस्थान के वार्षिक व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।

इस दौरान उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा का विषद वर्णन किया। उन्होंने कहा कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा के कारण ही संभव हो सका कि यहां के मनीषियों ने सृष्टि की उत्पत्ति संबंधी सटीक गणना की है। ऐसी गणना जो आधुनिक वैज्ञानिकों से भी ज्यादा प्रामाणिक है। उन्होंने कहा कि सृष्टि की रचना के साथ ही भारत ने ज्ञान अर्जन का काम शुरू कर दिया था, जो आज तक निरंतर जारी है। उन्होंने कहा कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा ही है कि एक सड़क किनारे बोरी पर बैठा सामान्य ज्योतिषी भी दशकों बाद लगने वाले सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की प्रामाणिक जानकारी दे देता है।

इस मौके पर आचार्य देवव्रत ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि हम जैसा व्यवहार अपने लिए चाहते हैं वैसा ही दूसरों के प्रति करें, यही धर्म है। उन्होंने कहां की भारतीय दर्शन के मूल बिंदु अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन करने से जीवन में संतुलित और सर्वांगीण विकास को हासिल किया जा सकता है।

इस मौके पर पंचनद शोध संस्थान के मार्गदर्शक एवं देश के जाने-माने शिक्षाविद श्री दीनानाथ बत्रा ने कहा कि देश में भारत का गौरव बढ़ाने वाली शिक्षा व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक षड्यंत्र के तहत पश्चिम विद्वान मैक्समूलर, लार्ड मैकाले और कार्ल मार्क्स ने यहां की शिक्षा प्रणाली को दूषित किया है। उन्होंने कहा कि मैक्समूलर को तो वेदों के अर्थ का अनर्थ करने के लिए प्रति पृष्ठ 5 पाउण्ड मेहनताना मिलता था। श्री बत्रा ने सभागार में मौजूद श्रोताओं से आह्वान किया कि वे शिक्षा में सुधार के लिए अपनी आवाज बुलंद करें।

इस मौके पर शोध संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष श्री कृष्ण सिंह आर्य ने कहा कि एक षड्यंत्र के तहत भारतीय ग्रंथों को विकृत किया गया है।

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