धर्म को सांप्रदायिक सीमाओं में न बांधें : जोशी

संघ के सरकार्यवाह ने किया पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी का आह्वान

विसंके, पंचकूला।
हिंदू उदार व सार्वभौम चिंतन है और इसे सांप्रदायिक सीमाओं में बांधना इसके साथ अन्याय होगा। यह कहना है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैय्याजी जोशी का। जोशी बुधवार को पंचकूला के सेक्टर-2 स्थित श्रीराम मंदिर में आयोजित प्रबुद्ध नागरिकों की विचार गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। गोष्ठी की अध्यक्षता लेफ्टिनेंट जनरल बीएस जसवाल ने की। इस मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्षेत्रीय के संघ चालक प्रो. बजरंग लाल गुप्त और कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल केजे सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
विचार गोष्ठी के मुख्य वक्ता सुरेश भैय्याजी जोशी ने पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सदभाव पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आदि काल से भारत की पहचान हिंदू धर्म से ही रही है और यह धर्म प्रकृति प्रेमी तथा हर जीव में ईश्वरीय तत्व को मानता है। उन्होंने उपनिषदों और गीता का हवाला देते हुए कहा कि जाति के आधार पर मनुष्यों का आपस में भेदभाव करना धर्म के मूल तत्वों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जातिवाद ने समाज का बड़ा नुकसान किया है, इसलिए हमें इन संकीर्णताओं से ऊपर उठ कर देशहित में सोचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति’ के सिद्धांत को मानता है। इसका अर्थ यह है कि यहां विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ एक-दूसरे की भावनाओं, मूल्यों का सम्मान करने की भी परंपरा रही है। भारत हिंदू राष्ट्र है और इसके उत्थान व पतन के लिए हिंदू समाज ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि हम प्रकृति के पूजक हैं और हमने प्रकृति को देवता के रूप देखते हुए उसकी पूजा की है। इसलिए धर्म पूजा के नाम पर नदियों को दूषित करने की इजाजत नहीं देता। जोशी ने कल्पवृक्ष का जिक्र करते हुए कहा कि इस नाम का कोई वृक्ष कहीं नहीं है, लेकिन हमारे पौराणिक आख्यानों में इसका खूब जिक्र मिलता है। हमने पूरे वनस्पति जगत को कल्पवृक्ष मानते हुए उसे जीवन का अंगभूत घटक समझा है। इसी प्रकार कामधेनु गाय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह शब्द हिंदू धर्म के जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम का ज्ञान करवाता है।
जोशी ने कहा कि असहिष्णुता की शुरुआत विचारों के कट्टरपन से आती है। जब कोई मजहब सिर्फ अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को तुच्छ समझने लग जाए तो दिक्कत खड़ी होती है। इस्लाम और ईसाई मजहब के मतालंबियों ने यही किया है। ये लोग सिर्फ और सिर्फ अपना ही मार्ग श्रेष्ठ समझते हैं, यहीं से असहिष्णुता की शुरुआत होती है। उन्होंने कहा कि भारत की तुलना चीन, अमेरिका, ब्रिटन आदि से नहीं करनी चाहिए, बल्कि भारत को भारत ही रहने देना चाहिए। इसके साथ ही जोशी ने प्रबुद्ध नागरिकों से भारतीय भाषाओं को बचाने का विशेष आह्वान किया। उन्होंने कहा कि चाहे कितनी ही भाषाएं सीखें, लेकिन भारतीय भाषाओं की शुद्धता खराब नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही जोशी ने आर्थिक जगत की चिंता करते हुए स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अनेक देश भारत को एक बाजार के तौर पर प्रयोग करना चाहते है, इसलिए देशवासियों का कर्त्तव्य बनता है कि वे भारतीय उत्पादों का प्रयोग कर यहां की अर्थव्यस्था को मजबूत करें।

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