देश को अखंड बनाने के लिए धर्म-संप्रदाय के नाम पर होने वाली हिंसा को करना होगा खत्म : मोहन भागवत

बहन भगिनी निवेदिता के 150वें जन्म दिवस पर बोले संघ प्रमुख

विसंके, कोलकाता।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने बहन निवेदिता के 150वें जन्मदिवस पर कोलकाता में राष्ट्रवाद विषय पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद जी ने जो राह चुनी थी वह व्यक्ति व समाज को तैयार करने की थी। बहन भगिनी निवेदिता ने स्वामी जी के आदेश का पूर्ण अनुशासन से पालन कर अपने लिए जो दिशा तय की वह उस समय चल रही व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए थी। भगिनी के जीवन में एक विशेष बात है कि वह जन्मता यूरोप की थी परंतु उसने अपने मानस को संपूर्ण बदलते हुए भारत के साथ अपने आप को एकाकार किया। विदेश में जन्मत एक व्यत्तिफ़ ने अपनी भत्तिफ़ बल पर यह किया है तो क्या हम करोड़ों भारतवासी आज की तारीख में स्वतंत्र देश में अपनी भक्ति इतनी नहीं बढ़ा सकते कि हममें से प्रत्येक व्यत्तिफ़ का जीवन भारत के साथ तन्मय हो जाए। भगिनी कहती थी कि भारत का अध्यात्मिकता के साथ अटूट संबंध है। इसलिए भारत को कोई मिटा नहीं सकता। इस राष्ट्रीयता के धर्म को निभाना है तो अपना सारा स्वार्थ त्यागना होगा। देश को अखंड बनाना है तो धर्म, संप्रदाय के नाम पर होने वाली हिंसा को ऽत्म करना होगा। देश के लिए आपसी मतभेद को भूल कर कार्य करना होगा। भागवत ने रविंद्र नाथ टैगोर का उदाहरण देते हुए कहा कि रविंद्र नाथ कहते थे कि विदेशी क्या सोचते हैं कि भारत के हिंदू-मुसलमान हमेशा ऐसे ही लड़ते रहेंगे ऐसा नहीं है। एक दिन यह इसका रास्ता निकाल लेंगे और वह रास्ता हिंदूत्व का ही रास्ता होगा। उन्हाेंने आह्नन करते हुए कहा कि, हिंदू और मुसलमान आपसी सहमति से भारत को श्रेष्ठ बना सकते हैं। हम सभी आपसी मतांतर के झगड़े भूला कर एक साथ मिलजुल कर रहेंगे। हम देश के विकास के लिए काम करेंगे और फिर से भारत जगत गुरु बन जाएगा। भगवत ने बताया कि एक पढ़े-लिखे मुसलमान ने उन्हें बताया कि भारत के हम सब मुसलमान भी तो हिंदू ही हैं, हम किसी कारण मुसलमान बन गए। आज भी हम कव्वाली गाते हैं क्योंकि भजन-कीर्तन की आदत गई नहीं। मुसलमानों को जागरूक करने के लिए शिक्षा जरूरी हैै। उन्हाेंने कहा कि 1940 तक हम भारत को एक अखंड प्राचीन राष्ट्र मानते थे। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में हुए रक्तपात के बाद यह विचारधारा टूट गई। हम भारत को सांस्कृतिक राष्ट्र मानना भूल गए। इससे ही देश को नुकसान हुआ है। अपने धर्म को नई अभिव्यत्तिफ़ देने के लिए विश्व में जो लेने लायक हो उसे लेकर भारतीय रूप देकर अपनाने के लिए संगठन की कला सीऽनी पड़ेगी। संगठन की कला सीऽने के लिए संवेदनशील, चारित्र संपन्न, आत्मीय व्यवाहार को सारे समाज को सीखना पड़ेगा। इससे भारत के राष्ट्रीयता का वो सनातन क्षुण प्रवाह अजयसर रूप लेकर फिर से बहने लगेगा। सारी दुनिया उसके सामने नतमस्तक होकर फिर एक बार विश्व गुरू सिंहासन पर अपनी भारत माता को बिठाएगी। दो हस्तों से अभय प्रदान करने वाली उस भारत माता के रूप को इसी जीवन में इन्हीं आंखों से देखने के लिए बहन भगिनी निवेदिता के उस उपदेश को समझ कर अपने जीवन का अंग बनाने की आवश्यकता है।

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