जीरो बजट की पद्धति अपना कर कम खर्च में अधिक उत्पादन ले सकते हैं किसान

खेती को रासायनिक उर्वरकों से बचने के लिए हुआ कार्यशाला का आयोजन 
करनाल, विसंके । समग्र ग्राम विकास, हरियाणा द्वारा प्रान्त में ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए 29 जुलाई को करनाल के घरौंडा (कुटेल खण्ड)  में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आयोजन का मुख्य उद्देश्य किसानों को जीरो बजट खेती के माध्यम से रासायनिक खेती का एक असरदार विकल्प प्रदान करना रहा।
कार्यक्रम में प्रान्त प्रमुख कुलदीप मुख्यवक्ता के तौर पर मौजूद रहे।  खण्ड के 32 ग्रामों से 120 किसानों ने कार्यक्रम में भाग लिया । ग्राम विकास प्रमुख महिपाल करनाल ने व्यक्ति व विषय परिचय से कार्यक्रम को प्रारम्भ किया। कृषि विकास अधिकारी डॉ. वज़ीर सिंह ने सुभाष पालेकर द्वारा प्रदत्त इस प्राकृतिक पद्धति जिसका उद्देश्य बीज, खाद, आदि किसी भी वस्तु पर बिना किसी खर्च किये व गांव का पैसा गांव में तथा शहर का पैसा गांव में आये सिद्धांत पर आधारित है का विस्तार से वर्णन किया गया। इस दौरान किसानों को जीवामृत व बीजामृत बनाने की विधि बताई ताकि इसका प्रयोग कर के किसान को किसी भी रासायनिक खाद की आवश्यकता नहीं पड़े। वैज्ञानिक तथ्यों द्वारा किसानों को समझाया कि जो नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश व अन्य सूक्ष्म तत्व जो हम अधिक उपज के लिए रासायनिक खादों से फसल को देते हैं वो तो मिट्टी व वातावरण में प्रचुर मात्रा में पहले से ही विद्यमान हैं और कैसे हम जीवामृत द्वारा उन्हें पौधों को उपलब्ध करवा सकते हैं, वह भी बिना किसी लागत के। रासायनिक खेती के अवगुणों का ज़िक्र करते हुए बताया कि कैसे किसान सुभाष पालेकर द्वारा सुझाई प्राकृतिक विधि का प्रयोग कर बिना लागत के अधिक पैदावार ले सकते हैं। डॉ. ओ.पी. चौधरी ने बताया कि कीड़ों की समस्या कैसे मानव ने स्वंय निर्मित की। कीटनाशियों के लगातार प्रयोग से असलियत में कीटों की जनसंख्या में वृद्धि होती है, नए-नए कीट फसल में आते हैं तथा कीटनाशियों के मानव जीवन पर दुष्परिणामों की चर्चा की। कीड़ों व बीमारियों की समस्या के निवारण हेतु  गोमूत्र, गोबर, नीम व अन्य वनस्पतियों के पत्तों आदि से उन्होनें नीमास्त्र, ब्रहमास्त्र, अग्निअस्त्र, सप्तधान्यानकुर व फफूंदनशिओं के निर्माण की विधि समझाई, जिसके प्रयोग से फसलों पर रस चूसने वाले, छेदक कीट व बीमारियों की पूर्णतय रोकथाम की जा सकती है। मधुमक्खी पालन द्वारा किसान अपनी आय व परपरागण द्वारा कैसे फसलों की पैदावार बढ़ा सकता है इस बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई। डॉ. संजीव कुमार ने हरियाणा में वृक्षों के क्षेत्र में भारी कमी के चलते पर्यावरण पर उनके प्रतिकूल प्रभाव पर चर्चा करते हुए पौधारोपण पर खास तौर पर पारम्परिक पौधों पीपल, बड़, आम आदि की ज़रूरत पर बल दिया। इस दौरान समाज में व्याप्त कुरीतियों का व उनके निवारण के उपायों पर सशक्त सुझाव रखे। तालाबों के लाभ व उनके नवीनीकरण पर भी प्रकाश डाला। कुलदीप ने इस विषय की वर्तमान परिवेश में सार्थकता व ग्रामों के समग्र विकास में उनकी  महत्वपूर्ण भूमिका को न केवल विस्तार पूर्वक बताया बल्कि किसानों द्वारा लम्बे समय से इस पद्धति द्वारा अत्याधिक सफलतापूर्वक खेती करते हुए कई गुणा आर्थिक लाभ प्राप्त कर रहे किसानों के अनुभव का भी उल्लेख किया। इस सम्पूर्ण पद्धति के केन्द्र “भारतीय देसी गाय जिसे आज किसान कम दुग्ध उत्पादकता के कारण छोड़ रहा है” कि वैज्ञानिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह दिन दूर नहीं जब गो माता ही हमारी खेती व ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सम्बल होगी। हम गाय को नहीं पर गाय ही हमें बचाएगी। समग्र ग्राम विकास के व्रहत उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए चरित्र निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण हेतु युवाओं का विशेष आह्वान कर उन्हें गांवों में शिक्षा, सफाई, समरसता, स्वास्थ्य व स्वावलम्बन  कार्यों द्वारा इस पावन यज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम के आयोजन में महति भूमिका निभाने वाले महेंद्र  ने आगन्तुकों का धन्यवाद दिया।

कार्यक्रम को सम्बोधित करते मुख्य वक्ता।

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