गोमाता कृषि और किसान के आर्थिक विकास का आधार : भैय्याजी जोशी

प्रथम एवं द्वितीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का पुणे में समापन
पुणे, विसंके। गोरक्षा केवल आस्था का विषय नहीं है। गोमाता इस देश में कृषि और किसान के आर्थिक विकास का आधार है। यह किसी संप्रदाय विशेष के विरोध में नहीं है। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सर कार्यवाह मा. भैय्याजी जोशी ने व्यक्त किए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग तथा पश्चिम क्षेत्र के द्वितीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का संयुक्त समापन समारोह अवसर पर प्रमुख वक्ता के रूप में मा. जोशी बोल रहे थे। मराठी पत्रिका ‘अंतर्नाद’ के संपादक भानू काले इस अवसर पर प्रमुख अतिथि रहे। पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के संघचालक सुरेश (नाना) जाधव,
द्वितीय वर्ष के सर्वाधिकारी अविनाश बडगे, प्रथम वर्ष के सर्वाधिकारी विलास चौथाई इस अवसर पर मंच पर उपस्थित रहे।
समारोह में शिक्षार्थियों ने घोष पथक संचलन और दंडयुद्ध, योगचाप, सूर्यनमस्कार, योगासन, नियुद्ध, सांघिक व्यायाम योग के प्रात्यक्षिक प्रदर्शित किए।

मा. जोशी ने कहा, “गोहत्या पर भी राजनीति की जा रही है, यह दुर्भाग्य की बात है। गौ केवल आस्था का विषय नहीं है। गाय हमारे विकास का मजबूत पक्ष रही है। गोरक्षा किसी संप्रदाय विशेष के विरोध में है, यह कहना असली मुद्दे से दिग्भ्रमित करना है। इस तरह संघर्ष निर्माण करना मेरी दृष्टी में सामाजिक पाप है।” उन्होंने कहा कि हिंदुत्व का चिंतन किसी भूमि अथवा जाति का चिंतन है, यह पूरे मानवता का चिंतन है। संघ की शक्ति यानि हिंदुत्व की शक्ति बढ़ रही है। संघ विचार के समर्थन में लोग खुलकर सामने आ रहे है। प्रचलित पद्धतियों से हटकर संघ ने अपनी पहचान बनाई है। प्राचीन विचारों को आधार पर संघ चलता है। संघ का कार्य कार्यकर्ताओं के आधार पर है, प्रचार-प्रसार के आधार पर नहीं है। कार्यकर्ताओं को सिद्ध करना इस कार्यपद्धति की विशेषता है।” उन्होंने कहा, कि इस देश के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का निर्माण करना संघ का कार्य है।”
संघ हिंदुओं के लिए क्यों काम करता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए मा. जोशी ने कहा, “सारी विषमताओं से मुक्त समाज बनाना आज हिंदू समाज की आवश्यकता है। दोष हिंदू समाज है इसलिए उसे निर्दोष बनाने के प्रयास कई महापुरुषों ने किए। इसलिए संघ ने अपना कार्यक्षेत्र हिंदू समाज ही माना है। इतिहास दर्शाता है, कि जब-जब इस देश का उत्थान हुआ उस समय हिंदू समाज जागृत था जबकि जब हिंदू समाज निद्रीस्त हुआ तब देश का पतन हुआ। संघ मानता है, कि राष्ट्र के उत्थान और पतन का कारण हिंदू समाज है।” आज कल हिंदुत्व पर बोलना संकुचित माना जाता है। ’वसुधैव कुटुंबकम’ का विचार विश्व को देने वाले हिंदुत्व को संकुचित कहना क्या उदारवाद कहा जाता है, ऐसा प्रश्न भी उन्होंने किया। “लोग कहते है, कि हमें विकसित होकर अमेरिका जैसा अथवा जापान जैसा बनना है। लेकिन हमें भारत का भारत बनकर रहने में ही सबका कल्याण है,” उन्होंने कहा। समाज में अशांति फैलाने के प्रयासों की ओर निर्देश करते हुए मा. जोशी ने कहा, “समाज में अशांति फैले और संघर्ष हो, इसी शक्तियां आज विद्यमान है। ऐसे प्रयासों को कभी-कभी सफलता मिलती हुई भी दिखाई देती है। दो व्यक्तियों का संघर्ष न होकर उसे दो जातियों के संघर्ष का रूप दिया जाता है। लेकिन सामाजिक समस्याओं का निराकरण सरकार से होना असंभव है। कोई भी सरकार यह काम नहीं कर सकती। इसके लिए सामाजिक संस्थाओं को ही पहल करनी होगी। ऐसी स्थिति में सामाजिक संस्थाओं का उत्तरदायित्व बढ़ता है। इस तरह की समस्याएं सुलझाने के लिए संस्थाओं की आवश्यकता है। पर ऐसी सकारात्मक विचार करनेवाली व्यवस्य़ा हमारे यहां दुर्बल है, यह हमारा दुर्भाग्य है।

राष्ट्रभाषा की आवश्यकता
लेखक भानू काले ने स्पष्ट किया, कि वे किसी भी प्रकार की संस्था अथवा विचारधारा से अस्पृश्यता में विश्वास नहीं करते। उन्होंने कहा, “रा. स्व. संघ के किसी कार्यक्रम में मैं पहली बार सम्मिलित हुआ हूं। यहां के अनुशासन को देखकर मैं प्रभावित हूं। इस वर्ग के दौरान युवा 21 दिनों तक मोबाइल से दूर रहते हैं, यह मेरे लिए अचरज की बात है। मैं संघ का अभिनंदन
करता हूं क्योंकि आज के जमाने में यह एक उपलब्धि है। ऐसे दृश्यों और कार्यक्रमों से विदेश में भारत की छवि निखरेगी।”
काले ने कहा, कि राष्ट्रनिर्माण के लिए कोई एक भाषा होना आवश्यक है। “आज जब विभिन्न प्रांतों के लोग एकत्र आते हैं तब हमें अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन हमें हिंदी को बढ़ावा देना होगा। कुछ लोग मानते है, कि राष्ट्र की अवधारणा दकियानूसी है जिसकी आज कोई सार्थकता नहीं। लेकिन मैं इस बात को नहीं मानता। राष्ट्र की अवधारणा का कोई विकल्प
नहीं है। किसी भी सेवा के लिए समर्पण चाहिए और समर्पण के लिए अधिष्ठान चाहिए। राष्ट्र से बढ़कर कोई और अधिष्ठान नहीं होता। राष्ट्र हमारी अस्मिता है और अस्मिता न हो तो हम मानवता के सागर में खो जाएंगे। अस्मिता के लिए राष्ट्र की अवधारणा का जतन करना आवश्यक है।” कार्यक्रम के लिए स्थानीय सांसद, विधायक, अवकाशप्राप्त सेनाधिकारी और
नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में ध्वज प्रणाम करते संघ के अधिकारी

कार्यक्रम के समापन अवसर पर अपनी कला का प्रदर्शन करते स्वयंसेवक

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