गुरु पूर्णिमा – गुरु के प्रति आभार का दिन

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: ।

गुरु साक्षात् परम्ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम: ।।

भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से ही गुरु को विशेष दर्जा प्राप्त है. यहां गुरु-शिष्य परंपरा सदियों पुरानी है. हमारे यहां गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान प्राप्त है. गुरु को ईश्वर का साक्षात्कार करवाने वाला माना गया है. गुरु की महानता का परिचय संत कबीर के इस दोहे से हो जाता है

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काकै लागूं पाये,

बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दियो मिलाये ।

328_11_05_17_bhagwa_dhwaj_2गुरु का महत्व तो गुरु शब्द में ही निहित है. संस्कृत में गु का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और रु का अर्थ है हटाने वाला. इसलिए गुरु का अर्थ है अंधकार को हटाने वाला. माता-पिता हमारे जीवन के प्रथम गुरु होते हैं जो हमारा पालन-पोषण करते हैं. हमें बोलना-चलना सिखाते हैं तथा वे सभी संस्कार देते हैं जिनके द्वारा हम समाज में रहने योग्य बनते हैं. उसके आगे जीवन को सार्थकता प्रदान करने के लिए जिस ज्ञान एवं शिक्षा की आवश्यकता होती है, वह हमें अपने आचार्य से प्राप्त होती है. पुरातनकाल में शिक्षा प्राप्ति के लिए गुरुकुलों की व्यवस्था थी, किन्तु आज वही शिक्षा स्कूल-कॉलेजों में दी जाती है. जहां0 आचार्य अर्थात् अध्यापक विद्यार्थी के स्वाभाविक गुणों को परिष्कृत कर उन्हें भावी जीवन के लिए तैयार करते हैं.

आषाढ़ मास की पूर्णिमा का दिन गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. हिन्दू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है. हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था. उन्होंने 18 पुराणों एवं 18 उपपुराणों की रचना की थी. जिसमें से महाभारत एवं श्रीमद् भागवत् उल्लेखनीय हैं. इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है. अनेक महान् व्यक्तियों के जीवन पर गुरु का अत्यधिक प्रभाव रहा है. स्वामी विवेकानंद को बचपन से ही परमात्मा को जानने की इच्छा थी,  उन्हें आत्म साक्षात्कार तभी हो सका, जब उन्हें गुरु रामकृष्ण परमहंस जी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ. छत्रपति शिवाजी के जीवन पर उनके गुरु समर्थ रामदास जी का प्रभाव हमेशा रहा. गुरु के मार्गदर्शन में जीवन दिशा ही परिवर्तित हो जाती है. आवश्यकता है गुरु के प्रति समर्पण, निष्ठा, विश्वास और श्रद्धा की.

गुरु जो स्वयं में पूर्ण है. जो पूर्ण है वही तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करवा सकता है. पूर्णिमा के चन्द्रमा की भांति जिसके जीवन में प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अन्त:करण में ज्ञान रूपी चन्द्र की किरणें बिखेर सकता है. गुरु हमारे जीवन को सही राह पर ले जाते हैं. गुरु हमारे अंदर संस्कारों का सृजन, गुणों का संवर्द्धन एवं दुर्भावनाओं का विनाश करते हैं. अतः गुरु पूर्णिमा सद्गुरु के पूजन का पर्व है. गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है. यह किसी व्यक्ति की पूजा नहीं, अपितु ज्ञान का आदर है, ज्ञान का पूजन है.

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार भगवान बुद्ध ने सारनाथ में आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पांच शिष्यों को उपदेश दिया था. बौद्ध धर्म के अनुयायी इसी गुरु-शिष्य परंपरा के तहत गुरुपूर्णिमा मनाते हैं. सिक्ख इतिहास में भी गुरुओं का विशेष स्थान एवं योगदान रहा है. केशधारी बंधु भी श्री गुरुग्रंथ साहिब जी को ही गुरु के रूप में मानते हैं. प्राचीनकाल में विद्यार्थी इसी दिन दीक्षा प्राप्ति के लिए गुरुकुलों में प्रवेश पाते थे और फिर स्नातक होने पर इसी दिन गुरुकुल से विदा भी लेते थे.

यह आवश्यक नहीं कि किसी देहधारी को ही गुरु माना जाये. मन में सच्ची लगन एवं श्रद्धा हो तो गुरु को कहीं भी पाया जा सकता है. एकलव्य ने मिट्टी की प्रतिमा में ही गुरु को ढूंढा और महान धनुर्धर बना. दत्तात्रेय जी ने चौबीस गुरु बनाये. उन्होंने संसार में मौजूद हर उस वनस्पति, प्राणी, ग्रह-नक्षत्र को अपना गुरु माना, जिससे कुछ सीखा जा सकता था.

वर्तमान युग में पुरातनकाल की गुरु-शिष्य परंपरा में कुछ विसंगतियां आ गई हैं. इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय इसके संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी ने ज्ञान, त्याग व यज्ञ की संस्कृति की विजय पताका भगवा ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया. विश्व के सबसे बड़े अनुशासित, स्वयंसेवी संगठन के रूप में संघ के विकास का एक प्रमुख कारक यह गुरु (भगवा ध्वज) ही है. प्रतिदिन शाखा में इसी भगवा ध्वज की छत्रछाया में एकत्रित होकर भारत माता को परम् वैभव पर ले जाने की साधना करोड़ों स्वयंसेवक विश्व भर में करते हैं. डॉ. हेडगेवार जी के अनुसार हम किसी व्यक्ति के विषय में यह विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि वह सदैव अपने मार्ग पर अटल रहेगा. इसीलिए उन्होंने व्यक्ति पूजा के स्थान पर भगवा ध्वज को गुरु के स्थान पर आरूढ़ किया. इस दिन स्वयंसेवक समर्पण भाव से भगवा ध्वज के समक्ष गुरु दक्षिणा अर्पण करते हैं, जो न तो शुल्क है, न ही चंदा. यह राष्ट्र के प्रति स्वयंसेवकों की श्रद्धा व प्रणाम ही है. भगवा ध्वज भारतीय संस्कृति की पराक्रमी परंपरा एवं विजय भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है.

लेखिका मोनिका गुप्ता

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *